लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Saturday, 11 April 2020

विक्रम संवत 2077 वार्षिक राशिफल: सभी 12 राशियों के लिए कैसा रहेगा नव संवत्सर 2077



प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य हरिप्रसाद जोशी

नव संवत्सर 2077 और वार्षिक राशिफल
 प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य हरिप्रसाद जोशी बता रहे हैं आपके लिए इस संवत्सर में राजा बुध और मंत्री चंद्रमा के संयोग का फल कैसा रहेगा, इसका ज्योतिषी विश्लेषण.

मेष राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही आपके राशि स्वामी मंगल उच्चराशिगत होकर दशम कर्म भाव में बैठे हैं और साथ में शनिदेव भी विराजमान है कार्यक्षेत्र की दृष्टि से यह योग शुभ कहा जा सकता है किंतु माता पिता के स्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा अतः इसका ध्यान रखें। पराक्रम भाव में राहु आपको अति साहसी, ऊर्जावान और उद्यमी बनाएंगे जिसके फलस्वरूप आप बड़े से बड़ा निर्णय अथवा कार्य बड़ी सहजता के साथ कर लेंगे।
  • अत्यधिक ऊर्जा के कारण आपको ज़िद एवं आवेश से बचना चाहिए और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों अथवा भाइयों से मतभेद ना होने पाए इसका ध्यान भी रखना चाहिए आरंभ से ही वृहस्पति आपके भाग्य भाव में बैठे हुए हैं जिनकी अमृत दृष्टि आपके ऊपर और आपके ज्ञान के ऊपर पड़ रही है, अतः शिक्षा प्रतियोगिता में अच्छी सफलता तो मिलेगी ही संतान संबंधी चिंता से मुक्ति भी मिलेगी।
  • नव दंपत्ति के लिए संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव का भी योग बनेगा और विवाह से संबंधित वार्ता सफल रहेगी। यात्रा देशाटन का पूर्ण आनंद उठाएंगे विदेश यात्रा एवं विदेशी नागरिकता के लिए आवेदन आदि करना चाह रहे हों तो भी यह वर्ष आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है लाभ उठाएं। व्यापारिक वर्ग के लिए भी अत्यधिक उतार-चढ़ाव के बावजूद व्यापार लाभदायक रहेगा।

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वृषभ राशि- 
  • वर्ष आरंभ से ही आपके राशि स्वामी शुक्र व्यय भाव में गोचर कर रहे हैं, जिसके फलस्वरूप आपके लिए वर्ष भागदौड़ अधिक कराएगा और विलासिता पर वह भी होगा। स्वास्थ्य विशेष करके बाई आंख का ध्यान रखना चाहिए। 29 मार्च बाद ही वृहस्पति आरती चारी होकर मकर राशि में चले जाएंगे जहां पर पहले से ही मंगल एवं शनि विराजमान है यहां पर वृहस्पति नीच राशि संज्ञक हो जाएंगे। अतः नौकरी में स्थान परिवर्तन एवं तनाव की संभावना बढ़ जाएगी इसलिए कार्यक्षेत्र में उच्चाधिकारियों से मधुर संबंध बनाकर रखें जहां तक संभव हो झगड़े विवाद से बचते रहें।
  • राहु का उच्चराशिगत होकर धनभाव में होना आकस्मिक धन प्राप्ति के योग तो बनाएगा किंतु, परिवार में कलह का भी सामना करवाएगा। आपके लिए विशेष सलाह है कि कोई भी बात ऐसी ना बोले कि विवाद पैदा हो और कठोर शब्दों का प्रयोग करने से बचें। जून के अंतिम सप्ताह में पुनः वृहस्पति अपनी राशि में आकर आपकी राशि से अष्टम मृत्यु भाव में चले जाएंगे जिसके परिणाम स्वरूप कठोर परिश्रम का सामना तो करना पड़ेगा किंतु आपको मान सम्मान भी मिलेगा।
  • आपके द्वारा लिए गए निर्णय एवं किए गए कार्यों की सराहना भी होगी इनकी अमृत दृष्टि आपके व्यभाव, धन और पराक्रम भाव पर भी पड़ेगी अतः धर्म-कर्म के मामलों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन करेंगे। व्यापारिक वर्ग के लिए उतार-चढ़ाव अधिक आएगा। विद्यार्थी वर्ग के लिए शिक्षा प्रतियोगिता में अच्छे अंक की प्राप्ति के लिए और प्रयास करने होंगे। सूर्यदेव का गोचर सरकारी कार्यो का निपटारा कराने में मदद करेगा यहांतककि सरकारी सर्विस हेतु आवेदन भी करना चाह रहे हों तो परिणाम आपके पक्ष में आने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
मिथुन राशि- 
  • आपकी राशि स्वामी बुध संवत्सर के आरंभ से ही भाग्य भाव में बैठे हुए हैं अतः वर्ष आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है कुछ महीने तक बुध का प्रभाव आपके लिए अति शुभ रहेगा अतः आपका व्यापारिक एवं आर्थिक पक्ष मजबूत होगा शासन सत्ता से संबंधित किसी भी कार्य का निपटारा करवाना हो तो प्रयास तेज करें उच्चाधिकारियों से अच्छे संबंध बनेंगे।
  • राहु पहले से ही आपकी राशि में विद्यमान है इसलिए यह संयोग भी आपको तीक्ष्ण बुद्धि वाला बनाएगा जिसके फलस्वरूप आपके लिए बड़े से बड़ा कार्य अथवा निर्णय लेना आपके लिए सहज हो जाएगा साथ ही आपकी राशि से सप्तम भाव में बैठे वृहस्पति की पूर्ण दृष्टि भी आपके ऊपर पड़ रही है जिसके प्रभाव स्वरूप शादी विवाह से संबंधित वार्ता सफल रहेगी नव दंपति के लिए संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव का भी योग बनेगा। ससुराल पक्ष से रिश्ते मजबूत बनेंगे। यदि आप व्यापारी हैं तो भी आपके लिए यह संयोग अतिशुभ साबित होगा।
  • काफी दिनों से रुका हुआ आपका धन वापस मिलेगा किंतु कोर्ट कचहरी के मामले बाहर ही निपटा लें तो बेहतर रहेगा क्योंकि अष्टम भाव में शनि और मंगल की युति आपको झगड़े विवाद से दूर रहने एवं वाहन सावधानी पूर्वक चलाने के संकेत कर रही है, कार्यक्षेत्र में भी षडयंत्र का शिकार होने से बचें, बेहतर रहेगा कि अपना कार्य संपन्न करें और सीधे घर आएं। स्वास्थ्य विशेषकर के रक्तविकार, जोड़ों में दर्द एवं वाद संबंधी रोगों से हमेशा सावधान रहना पड़ेगा। सूर्य एवं शुक्र का वर्तमान समय में गोचर आपके कार्य का विस्तार करेगा एक से अधिक आय के साधन बनेंगे।

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कर्क राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही राशिस्वामी स्वामी चंद्र भाग्य भाव में बैठे हुए हैं, जो अपने पुत्र बुध के नक्षत्र में विराजमान हैं यह संयोग आपके लिए वर्ष पर्यंत कवच का काम करेगा भाग्यभाव में सूर्य देव भी विराजमान हैं अतः व्यापार अथवा रोजगार के लिए यह संयोग अपेक्षाकृत बेहतर रहेगा नौकरी में पदोन्नति एवं स्थान परिवर्तन का भी योग बन रहा है। प्रशासनिक कार्यो का निपटारा होगा आपकी समझदारी इसी में है कि उच्चाधिकारियों से मधुर संबंध बनाकर रखें और अपने कार्य संपन्न करवाते रहें।
  • अपनी उच्चराशि में राहु आपके व्यय भाव में विराजमान हैं इसके परिणाम स्वरूप आपको कई बार व्यर्थ भागदौड़ का सामना करना पड़ेगा। लोग आपको कार्य के लिए बुलाएंगे, मीटिंग के लिए बुलाएंगे और पहुंचने पर वह मीटिंग कैंसिल कर देंगे जिससे आपको परेशान होना पड़  सकता है। वृहस्पति आपके शत्रुभाव में गोचर कर रहे हैं तो आपको हर समय स्वास्थ्य हेतु सावधान रहना ही पड़ेगा। गुप्त शत्रुओं से भी बचते रहना पड़ेगा।
  • मार्च के अंतिम सप्ताह से जून के अंतिम सप्ताह तक वृहस्पति अतिचारी होकर मकर राशि में प्रवेश करके आप पर उच्च दृष्टि डालेंगे अतः इस अवधि के मध्य आप कोई भी बड़े से बड़ा कार्य अथवा निर्णय लेना चाहें तो शीघ्रता से लें। शादी विवाह से संबंधित वार्ता सफल रहेगी और दैनिक व्यापार में अत्यधिक लाभ की संभावना रहेगी। रोजगार की दिशा में किया गया लगभग सभी प्रयास सफल रहेगा। जुलाई से पुनः ग्रह स्थितियों में सुधार होगा, आपको हर निर्णय सावधानीपूर्वक लेने पड़ेंगे।
  • सिंह राशि-
  • वर्ष के आरंभ से ही आपके राशि स्वामी सूर्य अष्टम प्रताप भाव में गए हुए हैं जिसके परिणाम स्वरूप आपको अग्नि, विष एवं  दवाओं के रिएक्शन से बचना पड़ेगा किंतु यही योग आपको मान सम्मान और प्रतिष्ठा भी दिलाएगा। वृहस्पति आपकी राशि से पंचम भाव में विराजमान है अतः शिक्षा प्रतियोगिता में अच्छी सफलता मिलेगी, संतान संबंधी चिंता से मुक्ति मिलेगी। यहां तक कि नव दंपत्ति के लिए संतान प्राप्ति के भी योग बन रहे हैं। प्रेम विवाह करना चाह रहे हों तो यह संवत्सर सहायक सिद्ध होगा।
  • गुरु के मकर राशि में गोचर के समय आपको गुप्त शत्रुओं से बचना पड़ेगा। राशि से भाग्य भाव में शुक्र का गोचर राजयोग का निर्माण करेगा अतः केंद्र अथवा राज्य सरकार के संबंधित विभागों में नौकरी आदि के लिए आवेदन करना हो अथवा किसी भी तरह का लाभ लेना हो तो यह  वर्ष उपयुक्त रहेगा नौकरी में स्थान परिवर्तन के भी योग बन रहे हैं।आपके द्वारा लिए गए निर्णय एवं किए गए कार्यों की सराहना भी होगी।
  • राशि से छठे भाव में मंगल शनि और लाभ भाव में राहु का होना आपको अति ऊर्जावान और उत्साही बनाएगा जिसके कारण कई बार आप निर्णय लेने में जल्दबाजी कर सकते हैं अतः विवादित मामलों से बचें जहां तक हो सके इसका सही उपयोग अपने कार्य व्यापार की सफलता के लिए लगाएं शत्रु परास्त होंगे और कोर्ट कचहरी के मामलों में निर्णय आपके पक्ष में आने के संकेत हैं। सितंबर से राहु के कर्क राशि में चले जाने के कारण आपके ग्रह गोचर में आया परिवर्तन आर्थिक तंगी ला सकता है उसके लिए अभी से सावधान रहें और अपव्यय बचें।
कन्या राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही आपके राशि स्वामी बुध छठे शत्रु भाव में बैठे हुए हैं अतः स्वास्थ्य के लिए यह योग थोड़ा सा प्रतिकूल रहेगा और अधिक कर्ज के लेनदेन से बचना पड़ेगा। यहां तक कि यदि आप किसी को कर्ज देना भी चाह रहे हों तो इस समय को टालें अन्यथा आपका दिया गया पैसा जल्दी वापस नहीं आएगा। मार्च के अंतिम सप्ताह से बृहस्पति का गोचर भी आपके लिए बेहतर हो जाएगा और विद्या भाव में तीन ग्रहों की युति शैक्षणिक एवं प्रतियोगिता के मामलों में कुछ चुनौतियां पेश कर सकती हैं अतः यदि आप विद्यार्थी हैं तो पढ़ाई के मामलों में लापरवाही न करें।
  • संवेदनशील बने, प्रेम संबंधी मामलों में निराशा हाथ लगेगी इसलिए अपने कार्य पर ध्यान देंगे तो बेहतर रहेगा। संतान संबंधी चिंता आपको तंग कर सकती है किंतु नव दंपत्ति के लिए संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव के योग बन रहे हैं। जुलाई से इन ग्रह स्थितियों में काफी सुधार आएगा और आपके सामने उपस्थित हुई विषम परिस्थितियां भी समाप्त होंगी। सूर्य का गोचर भी शादी विवाह से संबंधित मामलों में विलंब ला सकता है और दैनिक व्यापार में मंदी ला सकता है किंतु यह ज्यादा समय के लिए नहीं रहेगा परेशान ना हों।
  • दशम भाव में उच्च राशि गत राहु आपको मिलने वाली कठिन चुनौतियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करेगा आपकी प्रतिष्ठा को भी निखारेगा। राजनैतिक अथवा सामाजिक  मामलों के चुनाव से संबंधित निर्णय आपके पक्ष में होंगे अतः राजनीति में भी प्रवेश करने का यह बेहतरीन अवसर है। शासन सत्ता का पूर्ण उपयोग करते हुए अपने कार्य को संपन्न करें रोजगार की दिशा में किया गया रहा प्रयास अपेक्षाकृत बेहतर रहेगा स्थान परिवर्तन न घबराएं।
तुला राशि- 
  • आपके राशि स्वामी शुक्र संवत्सर के आरंभ से ही केंद्र भाव में बैठे हुए हैं जिसके प्रभाव स्वरूप संवत्सर का आरंभ सुखद परिणाम दिलाने वाला सिद्ध होगा, विशेष करके यह समय व्यापारिक वर्ग के लिए उत्तम रहेगा। राशि से पराक्रम भाव में बृहस्पति का गोचर आपको साहसी तो बनाएगा किंतु अतिचारी होकर गुरु के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही आपको मार्च के अंतिम सप्ताह से जून के अंतिम सप्ताह तक के मध्य पारिवारिक कलह एवं मानसिक अशांति का सामना करना पड़ेगा इन सबके बावजूद आपके लिए मकान वाहन के क्रय का योग बना हुआ है यदि कहीं की भी यात्रा कर रहे हैं तो अपने सामान की रखवाली स्वयं करें और घर में चोरी होने से सावधान रहें।
  • आपकी राशि के लिए राजयोग कारक ग्रह शनि भी अपने घर में चतुर्थ भाव में बैठे हुए हैं जिसके फलस्वरूप आपको माता पिता के स्वास्थ्य से कुछ चिंता तो होगी किंतु कार्य क्षेत्र में यह आपको सफल बनाएंगे। राजनीति अथवा राजनेताओं से गहरे संबंध रहेंगे इसलिए सरकार से जुड़े हुए कार्यों का निपटारा करने का सही समय है प्रतियोगिता में सम्मिलित होने वाले छात्र यदि नौकरी हेतु आवेदन करें तो सफलता की संभावना सर्वाधिक रहेगी।
  • यात्रा देशाटन का पूर्ण आनंद मिलेगा इसी पर आपका अत्यधिक व्यय भी होगा यदि विदेशी नागरिकता के लिए वीजा आदि का आवेदन करना चाह रहे हो तो उस दृष्टि से वर्ष अपेक्षाकृत बेहतर रहेगा। सितंबर माह से राहु और केतु का गोचर परिवर्तन कुछ कठिन चुनौतियां पेश कर सकता है अतः षड्यंत्र का शिकार होने एवं कोर्ट कचहरी के मामलों से बचना पड़ेगा।
वृश्चिक राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही आपके राशि स्वामी मंगल उच्च राशि गत होकर पराक्रम भाव में बैठे हुए हैं जिसके प्रभावस्वरूप यह योग आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है इन्हीं के साथ स्वराशि गत शनि भी बैठे हुए हैं जो आपको अदम्य साहसी एवं पराक्रमी बनायेंगे। आप जो भी निर्णय लेंगे, जैसा निर्णय लेंगे वह सफल रहेगा किंतु अति उत्साह में ऐसा निर्णय न लें जिसके कारण आपको सामाजिक विरोध का सामना करना पड़े। भाइयों से मतभेद का सामना करना पड़ सकता है इसलिए इसे ग्रह योग समझकर तूल न दें।
  • धनभाव में बृहस्पति का बैठना आकस्मिक धन प्राप्ति के योग तो बनाएगा किंतु इनके मकर राशि में गोचर के समय यह प्रभाव क्षीण रहेगा। जून के अंतिम सप्ताह से पुनः वृहस्पति के धनु राशि में आ जाने के फलस्वरूप आर्थिक पक्ष और मजबूत हो जाएगा परिवार के बड़े बुजुर्गों से सहयोग मिलेगा। शुक्र का शत्रु भाव में जाना स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील बनाएगा। गुप्त शत्रुओं से बचें। कार्यक्षेत्र में आपके खिलाफ षड्यंत्र होते रहेंगे इसके लिए सावधान रहें उच्चाधिकारियों से मधुर संबंध बनाकर रखें, राजनेताओं से भी गहरे संबंध बनेंगे।
  • समाज में पद प्रतिष्ठा बढ़ेगी और आपके द्वारा लिए गए निर्णय एवं किए गए कार्यों की सराहना होगी। नौकरी में पदोन्नति के लिए प्रयास करें स्थान परिवर्तन का प्रयास भी कर सकते हैं। अक्टूबर से ग्रह गोचर में आने वाला परिवर्तन आपकी कामयाबियों में बढ़ोतरी करेगा किंतु, शादी विवाह से संबंधित वार्ता में विलंब हो सकता है ससुराल पक्ष से मतभेद न पैदा होने दें।
धनु राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही आपके स्वामी बृहस्पति अपनी ही राशि में विराजमान है जो आपके लिए अत्यधिक शुभ फलदाई सिद्ध होते रहेंगे किंतु, मार्च के अंतिम सप्ताह से जून के अंतिम सप्ताह के मध्य यह अपनी नीच राशि 'मक'र राशि में चले जाएंगे जो आपके लिए कुछ अशुभ सिद्ध होंगे। जुलाई से पुनः यह अपनी राशि में आकर अति शुभ योगों का निर्माण करेंगे जिससे आपकी खोई प्रतिष्ठा वापस आएगी। झगड़े विवाद संबंधी मामलों का निपटारा होगा और आपका आर्थिक पक्ष मजबूत होगा।
  • इस समय इनकी दृष्टि आपके विद्या भाव पर पड़ेगी जिससे आपको शिक्षा प्रतियोगिता में सफलता मिलेगी। संतान संबंधी चिंता से मुक्ति मिलेगी और संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव के योग बनेंगे प्रेम विवाह करना चाह रहे हों तो योग अति उत्तम रहेगा। यही दृष्टि आपके लिए भाग्यभाव पर पड़ेगी अतः धर्म-कर्म के मामलों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे और विदेश यात्रा का योग बनेगा। विदेशी नागरिकता के लिए वीजा आदि का आवेदन करना चाहें तो शुभ परिणाम आपको अधिक खुशी दे सकते हैं। शादी विवाह से संबंधित वार्ता भी सफल रहेगी।
  • धनभाव में शनि देव का गोचर अनवरत चलता रहेगा इसलिए आकस्मिक धन प्राप्ति के योग के साथ-साथ किसी महंगी वस्तु के क्रय का भी योग बनेगा। मकान वाहन से संबंधित क्रय का निर्णय ले रहे हो तो विलंब ना करें सफलता की संभावना सर्वाधिक रहेगी। सितंबर से राहु और केतु का राशि परिवर्तन आपको शत्रुमर्दी बनाएगा फिर भी विवादों से बचें और कोर्ट कचहरी के मामले बाहर ही निपटा लें तो बेहतर रहेगा।
  • मकर राशि- 
  • आपकी राशि के स्वामी शनि स्वयं अपनी ही राशि मकर में विद्यमान हैं और अतिशुभ योगों का निर्माण कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप वर्ष आपके लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है अतः, अपने कार्य एवं नीले पूर्ण सावधानी के साथ करते हुए चलेंगे तो सफलता आपके कदम चूमेगी। इनके साथ उच्च राशिगत मंगल भी विद्यमान हैं यद्यपि शनि मंगल की युति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती किंतु कामयाबी की दृष्टि से यह ठीक तो है स्वास्थ्य की दृष्टि से कुछ अशुभ है अतः यात्रा सावधानीपूर्वक करें दुर्घटना से बचें और जोड़ों में दर्द की बीमारियों से बचते रहे।
  • कुछ दिनों के लिए अतिचारी होकर वृहस्पति भी इनके साथ आ रहे हैं जिससे स्वास्थ्य में थोड़ा सा सुधार तो होगा किंतु आप थकान का अनुभव करेंगे और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है इसे ग्रह योग समझकर भूलने की कोशिश करें। जुलाई से पुनः बृहस्पति आपके भाव में चले जाएंगे जिससे आपको किसी और देश की नागरिकता के लिए आवेदन करना सफलता दिला सकता है। धर्म-कर्म के मामलों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे परिवार में मांगलिक कार्यों का शुभ अवसर आएगा।
  • इस राशि के योग कारक ग्रह शुक्र भी केंद्र गत हैं अतः मकान वाहन के क्रय का योग बनेगा। काफी दिनों से रुका हुआ आपका धन वापस आएगा यात्रा सावधानीपूर्वक करें, सामान चोरी होने से बचाएं संतान संबंधी चिंता से पूर्ण मुक्ति मिलेगी। व्यापारिक वर्ग के लिए भी यह समय अत्यधिक लाभदायक सिद्ध होगा इसलिए अपने कार्य व्यापार के प्रति सजग रहें अधिक उधार देने से बचें। सितंबर से राहु केतु का राशि परिवर्तन भी आपको सहयोग करने लगेगा इसलिए संयम पूर्वक अपने कार्य में लगे रहें।

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कुंभ राशि- 
  • संवत्सर के आरंभ से ही आपके राशि स्वामी शनि व्यय भाव में गए हैं यद्यपि वह अपनी ही राशि के हैं फिर भी आपको अत्यधिक संघर्ष के बाद ही आर्थिक लाभ पहुंचाएंगे भागदौड़ की अधिकता रहेगी जिसके परिणाम स्वरुप आपको आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ सकता है। कुछ दिनों बाद वृहस्पति के भी आ जाने से शनि मंगल वृहस्पति की युति आपकी और भी परीक्षा ले सकती है अतः वर्ष का आरंभ आपके अति संयम और सावधानी बरतने का है क्योंकि आपके बारहवें भाव में मंगल और दूसरे भाव में सूर्य के परिणाम स्वरूप आपकी राशि पर दबाव सर्वाधिक है इसलिए इस समय आप जिम्मेदारियों से जूझ रहे होंगे।
  • सबसे योगकारक ग्रह शुक्र का गोचर अपेक्षाकृत बेहतर रहेगा इसलिए साहस और पराक्रम वृद्धि होगी। यदि आप महिला हैं तो पुरुष और पुरुष हैं तो महिला आपके कार्यक्षेत्र में आपकी मदद करेंगे। जुलाई से वृहस्पति का शुभ गोचर आपको शिक्षा प्रतियोगिता में अच्छी सफलता दिलाएगा सोची समझी रणनीति भी कारगर रहेगी यदि आप प्रेम विवाह करना चाह रहे हों तो यह अवसर उपयुक्त रहेगा। नव दंपति के लिए संतान प्राप्ति एवं प्रादुर्भाव के भी योग बन रहे हैं। गुरु की शुभ दृष्टि प्रभाव स्वरूप रुके हुए कार्य बनेंगे नए लोगों से मेलजोल बढ़ेगा विदेश यात्रा का भी संयोग है।
  • आरंभ में राहु एवं केतु का गोचर आपको मानसिक रूप से परेशान कर सकता है पारिवारिक कलह दे सकता है और स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव डाल सकता है इसलिए हर कार्य अथवा निर्णय बहुत सोच समझकर सावधानीपूर्वक लेना ही आपके लिए वर्ष पर्यंत श्रेयष्कर रहेगा। सितंबर माह से  कई ग्रहों के राशि परिवर्तन के प्रभाव स्वरूप विषम परिस्थितियों से कुछ हद तक मुक्ति मिलेगी किंतु तनाव की अधिकता एवं आर्थिक तंगी से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • मीन राशि- 
  • वर्ष आरंभ से ही आपके राशि स्वामी बृहस्पति स्वराशि होकर दशम कर्मभाव में बैठे हुए हैं जिसके प्रभाव स्वरूप आपके कार्यक्षेत्र का विस्तार होगा जो कार्य करना चाहें जिस तरह से करना चाहें उसमें सफलता मिलेगी शासन सत्ता का पूर्ण सुख मिलेगा और उच्चाधिकारियों से संबंध बना रहेगा। इस अवधि के मध्य यदि सरकार से संबंधित कोई निर्णय अपने पक्ष में करवाना चाहें तो अवसर अच्छा रहेगा। कुछ दिनों बाद आपके लाभभाव में गुरु शनि और मंगल की युति एक साथ हो जाएगी जो आपके लिए लाभदायक तो रहेगी किंतु, स्वास्थ्य की दृष्टि से इस पर कुछ प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है इसलिए सावधान रहें।
  • अच्छी संगति करें नशाखोरी से दूर रहें। गुरु की दृष्टि इस अवधि के मध्य आपके संतान एवं पत्नी भाव पर पड़ रही है जिसके फलस्वरूप आप को संतान संबंधित चिंता से मुक्ति मिलेगी यदि किसी भी तरह की प्रतियोगिता में बैठना चाह रहे हों तो यह अवसर उपयुक्त रहेगा और सफलता की संभावना सर्वाधिक रहेगी। विवाह संबंधित वार्ता भी सफल रहेगी। ससुराल पक्ष से रिश्ते मजबूत बनेंगे नव दंपति के लिए संतान प्राप्ति के भी योग बन रहे हैं। यही योग कार्य व्यापार के लिए अति उत्तम सिद्ध होगा।
  • सितंबर से राहु केतु एवं बृहस्पति का राशि परिवर्तन भी आपके लिए वरदान सिद्ध होगा उस समय आपके अदम्य साहस एवं पराक्रम की वृद्धि होगी आपके द्वारा किए गए कार्य एवं लिए गए निर्णय की सराहना तो होगी किंतु अत्यधिक ऊर्जावान एवं उत्साही होने के फलस्वरूप आप अपनी जिद एवं आवेश पर नियंत्रण रखते हुए कार्य करेंगे तो वर्ष आपके लिए बेहतरीन सिद्ध होगा।

Thursday, 19 March 2020

'जनता कर्फ्यू' के बारे में वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं


   Hariprasad Joshi

कोरोना वायरस को लेकर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया। उन्होंने साफ शब्दों में देश को इससे सतर्क रहने का संदेश दिया। संयम के साथ इस संकटपूर्ण स्थिति से मुकाबला करने का भी मंत्र दिया। खासतौर पर उन्होंने जनता कर्फ्यू का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जनता को धैर्य के साथ इस स्थिति का मुकाबला करना होगा। 
  • मैं आज से जनता कर्फ्यू की मांग करता हूं। यानि जनता के लिए, जनता द्वारा लगाया गया कर्फ्यू। 22 मार्च रविवार को सुबह 7 से रात 9 बजे तक सभी देशवासियों को जनता कर्फ्यू का पालन करना है। जनता कर्फ्यू हमें आने वाली चुनौती से भी तैयार करेगी।  
  • हमें 22 मार्च को शाम 5 बजे ताली या थाली बजाकर, सायरन बजाकर सेवाभावियों का धन्यवाद करना चाहिए।
  • इस दिन कोई भी नागरिक घर से बाहर न निकले, न सड़क पर जाए, न मोहल्ले में जाए। लेकिन जो जरूरी काम में लगे हैं वो अपना कर्तव्य निभाएं। जनता कर्फ्यू आने वाली चुनौती से भी हमें तैयार करेगा। राज्य सरकारों से आग्रह करूंगा कि वो जनता कर्फ्यू पालन कराएं।
  • 22 मार्च को शाम पांच बजे हम दरवाजे, बालकनी से हम काम करने वालों के लिए आभार प्रदर्शित करें। कैसे? ताली बजाकर, घंटी बजाकर। मैं स्थानीय प्रशासन से आग्रह करता हूं कि वे सायरन बजाकर सभी को इसके बारे में बताएं।
  • मैं एक और गुजारिश करना चाहता हूं। लाखों लोग अस्पताल, एयरपोर्ट, दफ्तरों में व्यस्त हैं। लोगों ने दूसरों की खातिर काम किया है। उन्होंने खतरे के बावजूद लगातार काम किया है। ये लोग वायरस और देश के बीच एक सुरक्षा की तरह हैं। पूरा देश इन्हें सैल्यूट करता है। 
  • ये जनता कर्फ्यू दुनिया को दिखाएगा कि हम इस वायरस से लड़ने के लिए कितने तैयार हैं।
  • पीएम मोदी ने कहा कि एक व्यक्ति अन्य दस लोगों को जनता कर्फ्यू की जरूरत के बारे में बताए। 
  • एनसीसी, एनएसएस व धार्मिक संस्थाएं से निवेदन करता हूं कि वो जनता कर्फ्यू के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताएं। 
  • 22 मार्च का दिन हमारे लिए टेस्ट का दिन होगा कि हम वायरस से लड़ने के लिए कितने तैयार हैं। 
  • पहले के दिनों में युद्ध के समय लोग घरों की लाइट बंद कर लेते थे। इसी तरह से रोम में भी किया गया ताकि जरूरत के समय इसे अपनाया जा सके। 
Copy from Amar ujyala.....

Wednesday, 18 March 2020

Coronavirus कौनसे ग्रह हैं इस महामारी के कारण

                                             coronavirus 👊👊👊


                                         Astrologer: Hariprasad Joshi

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, शनि, राहु और केतु ये तीनों ग्रह अप्रत्याशित परिणामों के कारक गए हैं। शनि जब अपनी स्वराशि में आता है, अप्रत्याशित घटनाओं को पैदा करता है। वर्तमान में शनि अपनी स्वराशि मकर में स्थित है। इस साल 24 जनवरी को यह इस राशि में आया था। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, शनि इस महामारी का कारक है। इसके अलावा चंद्रमा इस बीमारी को फैलाने में अपनी भूमिका निभा रहा है। क्योंकि समुद्र और समुद्र से संबंधित चीजों के लिए चंद्रमा उत्तरदायी है। साथ ही मंगल और केतु भी गुरु के साथ धनु राशि में बैठे हैं जो कि इस स्थिति को गंभीर बना रहे हैं। लेकिन 22 मार्च 2020 को जब मंगल शनि की राशि मकर में प्रवेश करेगा तो परिस्थितियां और भी गंभीर हो सकती हैं। 

इतिहास बताता है कि साल 1312 में जब शनि मकर राशि में आया था तब पूरा यूरोप प्लेग जैसी महामारी से ग्रसित हो गया था। इस महामारी ने 7.5 करोड़ लोगों को मौत की नींद सुला दी थी। 1666 में भी शनि का मकर राशि में होना पुनः दुनिया के लिए बड़ा खतरा बना। इस दौरान प्लेग के कारण केवल लंदन की 20 फीसदी आबादी खत्म हो गई थी। फिर उन्नीसवीं सदी में भी शनि के अपनी स्वराशि में परिवर्तन से करोड़ों लोगों की मौतें हुई थी।

गुरु का राशि परिवर्तन करेगा इस महामारी का खात्मा
देव गुरु बृहस्पति कोविड-19 इस महीने 30 मार्च को राशि परिवर्तन कर रहे हैं। ज्योतिष गणना के मुताबिक गुरु का राशि परिवर्तन इस महामारी का काल बन सकता है। बृहस्पति का मकर में प्रवेश शनि-मंगल के इस प्रकोप को खत्म करेगा। शनि-बृहस्पति की युति इस महामारी को कमजोर कर देगी। वहीं 4 मई 2020 को जब मंगल मकर से कुंभ राशि में जाएगा तब इस वायरस का प्रभाव बहुत ही कम हो जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, कोरोना वायरस का कहर मई 2020 में कम हो जाएगा। हालांकि तब तक सुरक्षा और सावधानी ही बचाव है। 

Monday, 17 September 2018

गीता के श्लोक एवं भावार्थ : गीता का प्रथम अध्याय

                               ज्योतिष: हरिप्रसाद जोशी


 
अथ ध्यानम्
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

 
भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
 
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-
र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-
यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।
 
भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।

( दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन )
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥
भावार्थ :  धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥
संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌ ॥
भावार्थ :  संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा॥2॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥
भावार्थ :  हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए॥3॥
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌ ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः ॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥
भावार्थ :  इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं॥4-6॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥
भावार्थ :  हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ॥7॥
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥
भावार्थ :  आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा॥8॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
भावार्थ :  और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं॥9॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥
भावार्थ :  भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है॥10॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥
भावार्थ :   इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें॥11॥
 
( दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन )
 
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌ ॥
भावार्थ :  कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया॥12॥
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌ ॥
भावार्थ :  इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ॥13॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥
भावार्थ :  इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए॥14॥
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः ॥
भावार्थ :   श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया॥15॥
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥
भावार्थ :  कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए॥16॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥
भावार्थ :  श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए॥17-18॥
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌ ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ॥
भावार्थ :   और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए॥19॥
 
( अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग )
 
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाचः
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥
भावार्थ :  हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए॥20-21॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥
भावार्थ :  और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए॥22॥
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥
भावार्थ :  दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा॥23॥
संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ ॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥
भावार्थ :  संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख॥24-25॥
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌ ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
भावार्थ :  इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌ ।
भावार्थ :  उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। ॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥
 
 
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )
 
अर्जुन उवाच 
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥
भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
भावार्थ :  हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ॥30॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
भावार्थ :  हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता॥31॥
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
भावार्थ :  हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?॥32॥
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥
भावार्थ :  हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं॥33॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा ॥
भावार्थ :  गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं ॥34॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
भावार्थ :  हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?॥35॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः ॥
भावार्थ :  हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा॥36॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌ ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
भावार्थ :  अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?॥37॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
भावार्थ :  यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?॥38-39॥
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥
भावार्थ :  कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है॥40॥
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥
भावार्थ :  हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है॥41॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
भावार्थ :  वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं॥42॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥
भावार्थ :  इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं॥43॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥
भावार्थ :  हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं॥44॥
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
भावार्थ :  हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं॥45॥
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥
 
भावार्थ :   यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा॥46॥
 
संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
 
भावार्थ :  संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए॥47॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। ॥1॥

Friday, 13 April 2018

नयाँ वर्ष वि.सं. २०७५ सालको वार्षिक भविष्य र राशिफल तथा शुभकामना सन्देश ।। शुभकामनाः

ज्योतिष श्री हरिप्रसाद जोशी 




मन–मस्तिष्क र व्यवहारमा अहिंसा, दया–करुणा, मानवीयता, सद्नियत, सद्बुद्धि, सत्–मार्ग अवलम्बन, अध्यात्म–आत्मोन्नतिको अभ्युदय एवं स्वबोध होस् । स्वास्थ्यमा आरोग्यता, व्यवहारमा कुशलता र चरित्रमा नैतिकताको विकास होस् । यश ऐश्वर्य एवं श्री र कृतिको वृद्धि होस् । भगवान पशुपतिनाथ भोलाशङ्कर र आदिशक्ति भगवतीको आर्शिवाद परिरहोस् । राष्ट्रको सच्चा ईमान्दार चरित्रवान नैतिकवान नागरिकको रूपमा प्रतिष्ठा स्थापित होस् ।

धर्मेण हन्यते ग्रहाः धर्मेण हन्यते व्याधि धर्मेण हन्यते शत्रु । यतो धर्म ततो जय । अर्थात धर्मले ग्रहको दुष्प्रभाव, रोगव्याधि र शत्रुको नाश हुन्छ । तसर्थ धर्मको मर्मबोध होस् । सद्कर्ममा दिल रहोस, उत्तरोत्तर प्रगतिहोस् देश–विदेशमा रहनु भएका यहाँहरू सबैप्रति नव वर्ष २०७५ को हार्दिक मङ्गलमय शुभकामना व्यक्त गर्दछु ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चितदुःखभाग्जनः ॐ शान्तिः ! ॐ शान्तिः!! ॐ शान्तिः !!! ॐ सर्व मङ्गलम् !


बकतचयमभभउबपनगचग२नmबष्।िअय
ग्रहा राज्यं प्रयच्छन्ति ग्रहा राज्यं हरन्ति च ।
ग्रहैव्र्याप्तमिदं सर्व त्रैलोक्यं स चराचरम् ।।

नयाँ वर्ष वि.सं. २०७५ सालको वार्षिक भविष्य

शुभकामना  शुभकामना शुभकामना ।।।
       सृष्टितो गताब्दा १९५५८८५११९, कलेर्गताब्दा ५११९, श्री शालिवाहनीय शाके १९४० , नेपाल संवत् ११३८-११३९ ।
यस पटक नयाँ वर्ष २०७५ शुरु हुँदा बैशाख १ गते बिहान नेपाली स्टेण्डर्ड समय अनुसार १०ः२३ बजिरहेको हुन्छ । सो समयमा नेपाली आकाशको क्षितिजमा मिथुन लग्न उदाइरहेको हुनेछ । नयाँ वर्ष अर्थात मेषार्क हुँदा जापानमा त्याहाँको स्टेण्डर समय अनुसार १३ः३८ बजे बजेको हुन्छ र त्यतिबेला जापानको टोक्योमा सिंह लग्न उदित भइरहेको हुन्छ । यसै गरी पाकिस्तानको लाहोरमा पाकिस्तानी स्टेण्डर समय अनुसार बिहान ०९ः३८ बजिरहेको हुन्छ र मिथुन लग्न नै उदाइरहेको हुन्छ । भारतको मुम्बईमा १०ः०८ बजे नयाँ वर्ष प्रवेश हुन्छ । जतिबेला भर्खर मिथुन लग्न उदाउँदै गरेको हुन्छ भने राजधानी दिल्लीमा मिथुन लग्नले आठ डिग्री पार गरिसकेको हुन्छ । विक्रम सम्वतको नयाँ वर्ष हुँदा अर्थात सूर्यले ३६० डिग्री पार गरेर शून्य डिग्रीबाट पुनः आफ्नो यात्रा तय गर्दा सबै ठाऊँमा एउटै लग्न हुँदैन । जुन स्थानमा जुन लग्न उदाईरहेको हुन्छ सोही लग्न सो स्थानको जगल्लग्न हुन्छ । जगल्लग्नको आधारमा वार्षिक फलको विवेचना गरिन्छ ।

नयाँ वर्ष प्रारम्भको समयमा नेपालमा मात्रै नभएर यसको आसपासका अन्य मुलुकमा पनि मिथुन लग्न उदाइरहेको हुनेछ । नव वर्ष प्रारम्भ हुँदाको जगल्लग्नको विवेचना गर्दा –

सकारात्मक पाटोः

यो वर्ष सूर्य राजा र मन्त्रीमा शनिले जिम्मेवारी लिएका छन् । यो वर्षको संवत्सरको नाम विरोधकृत् रहेको छ । ग्रहको स्वभाविक गुणको विवेचना गर्दा सूर्य र शनि आपसमा शत्रु हुन् । ग्रहको यो सम्बन्धबाट पनि केही अनुमान गर्न सकिन्छ । विशेष विशेष जिम्मेवारीमा रहेका अधिकारी तथा निकायले यो कुरामा विचार पुर्याएर कार्य सम्पादन गर्नु उचित हुनेछ ।

पञ्चम् गुरु, दशममा लग्नेश र द्वितीयेश चन्द्रबुधको युक्ति, एकादश सूर्य शुक्रले जगल्लग्नमा महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गरेका छन् । शिक्षा, कर्म र आम्दानीको पक्षमा उल्लेखनीय कार्य गराउने योग परेको छ । स्वाभिमानलाई अभिमान नबनाउने हो भने यो जगल्लग्नको प्रभाव रहने स्थानहरूमा शिक्षाक्षेत्रमा राम्रो प्रगति हुनेछ । उद्यम व्यवसायजन्य कर्मयोगले विशेष महत्त्व पाउनेछ । आत्म तथा आत्मस्वाभिमानी भावनाको चेतना तथा जागृति बढ्ने छ । राज्य व्यवस्थामा नयाँ आयामहरूको विकास हुनेछन् । आत्मनिर्भरताका केही दीगो कार्यको थालनि हुनसक्ने छ ।

यो वर्ष राज्यले नागरिकहरूलाई उद्योग धन्दाको अभिप्रेरणाप्रद अभियानका कार्यक्रमहरूबाट जनचेतना अभिवृद्धि गर्नु उचित हुनेछ । शिक्षा र धार्मिकलगायतका पर्यटन, युवा उद्यमशीलता, जलस्रोत तथा तरलपदार्थ, कृषि, जनजागरण आदिको विकास भई लाभ एवं उपलब्धि प्राप्ति हुनेछ ।

कमजोर तथा नकारात्मक पक्षः

जगल्लग्नमा उपर्युक्त राम्रा पक्षको बाबजुत केही जटिल स्थितिको पनि दृष्टिगोचर हुन्छ । अन्य ग्रहको भूमिकाले केही त्यस्ता जोखिमलाई संकेत गरिरहेको छ जसले राम्रो ग्रहयोगको फल प्राप्तिमा तगारोको भूमिका निर्वाह गर्नसक्ने खतरा हुन्छ । सम्बन्धित अधिकारीहरूले बुद्धिमतापूर्वक अवस्थालाई संयमपूर्वक सकारात्मक कोणबाट समाधान गर्न खोजेको खण्डमा विभिन्न जटिलताको बाबजुत पनि अन्तिम उपलब्धि राम्रो निकाल्न सकिनेछ । अन्यथा केही व्यवस्थागत दुर्घटना, द्वन्द, संकट आदिको आशङ्कालाई ग्रहको स्थितिले लक्षित गरिरहेको छ ।

यौनिक हिंसा तथा विकृति बढ्नसक्ने, अग्नि एवं भूमि र वायुतत्त्व प्रधान प्रकृतिप्रकोप, दैविक विपत्ति, दुर्घटना, हावाहुरी, आगजनि, वृष्टिअनावृटि आदिको सामना गर्नुपर्ने सम्भावना रहन्छ । जनस्वास्थ्यमा विभिन्न रोगको संक्रमणले प्रभावित गर्नेछ । परराष्ट्र सम्बन्ध बिग्रन नदिन निकै कोसिस् गर्नुपर्ने देखिन्छ । वैदेशिक व्यापारमा पनि ह्रास आउनसक्ने आशङ्का देखिएको छ । आन्तरिक एवं बाह्य द्वन्दको सृजना हुनसक्छ । सम्बन्ध विच्छेदका गतिविधि तथा घटना बढ्ने छन् । जननिकाय, सामाजिक निकाय आदिका तहतप्कामा गुट्, फुट्, आन्तरिक कलह, द्वन्दजन्य परिस्थिति सृजना गराउने ग्रहको प्रभाव छ । जिम्मेवार पक्षले निकै संयमतापूर्वक आफ्नो कर्तव्य एवं जिम्मेवारीलाई वहन गर्न प्रयत्नशील रहनु बुद्धिमानी हुनेछ ।

उपर्युक्त प्रकारको फललाई नववर्ष २०७५ को जगल्लग्नको ग्रहस्थितिले देखाएको हुनाले नागरिकहरू सावधानपूर्वक, धैर्यता एवं सहनशीलतालाई धारण गरी स्वधर्म तथा जिम्मेवारीमा लगनशील रहनु उपयुक्त हुनेछ । अनाधिकृत रुपमा चल्ने होहल्ला, विभिन्न बहकाव आदिको पछाडि लाग्नुभन्दा सत्यतथ्य बुझेर समाजमा आपसी सद्भाव कायम राख्दै सामाजिक भावनाको विकास गर्नु बुद्धिमानी हुनेछ । सम्भावित अनिष्ट ग्रहको फललाई न्यूनिकरण गर्ने सामाजिक एवं धार्मिक तथा सांस्कृतिक कर्महरूलाई बढीभन्दा बढी प्रसय दिनु शुभकर, हितकर र लोककल्याणकर हुनेछ ।

नव वर्ष २०७५ को राशिफल

मेष राशि (चु.चे.चो.ला.लि.लु.ले.लो.अ.) –

मेष राशि हुनेहरूको लागि यो वर्ष पूर्वार्ध सम्म र अन्तिमका दुई महिना सामान्यतया अनुकूलै मान्न सकिन्छ । बीचको समय अल्लि विपरित रहेकोले होस एवं संयमको आवश्यकता देखिन्छ । अल्लि बढी प्रयत्नले धार्मिक एवं आध्यातिमक कार्यमा केही उपलब्धि लिनसकिने छ । सम्पादन गर्न खोजिएको विवाह व्रतबन्धादि दानपूण्यप्रद माङ्गलिक शुभकर्ममा ढिलासुस्ति बाबजुत केहीहद्सम्म सफल भइनेछ । व्यापारजन्य आय–आम्दानी बढ्नेछ । विवाहयोग्यलाई दाम्पत्यसम्बन्ध जोडिने छ भने प्रेमपारखीहरूको लागि पनि अनुकूल रहनेछ । नोकरीतर्फ थोरैभएपनि प्रगति हुनेछ । जागिर तथा पेशा व्यवसायमा स्थानपरिवर्तन, बसाईसराई लगायत यात्राजन्य काम बन्ने छ । अध्ययन अध्यापन तथा शैक्षिक क्षेत्रमा अनुकूलता रहनेछ ।

जग्गाजमिन, घर, पैतृकसंपत्ति जन्य पक्षमा ग्रहको त्यति अनुकूल प्रभाव देखिन्न । पशुचौपाय, कृषि, उद्योग धन्दा व्यवसाय आदिमा घरीघरी उपलब्धि एवं लाभजस्तो पनि कुनै समय निराशाजनक परिणाम भोग्नुपर्ने हुन्छ । धार्मिक आस्थामा पनि स्थिरता रहन मुस्किल पर्नेछ । केही यस्ता विपरित फलको बाबजुत बढी मेहनत र तल्लिनताले कुनै कुनै पक्षमा ठिकै उपलब्धि हासिल गर्नसकिने छ ।

कैफियतपूर्ण धनार्जनतर्फ मन आकर्षित हुनसक्ने र पछि पछुतो पनि पर्नसक्ने छ ख्याल गर्नु होला । मान्यजनको स्वास्थ्य, विशिष्ट सम्बन्ध आदिमा केही प्रतिकूलता सृजना हुनसक्ने भएकोले आवश्यक सावधानी एवं निवारणका उपाय अवलम्बन गर्नु जरुरी हुनेछ । वर्षको उत्तरार्धमा उल्लेखित संघर्ष एवं विपरित फल बढी घटित हुने भएकोले आवश्यक सावधानी तथा उपाय अवलम्बन गर्नु जरुरी हुनेछ । यो राशि हुनेहरूले यो वर्ष भैरव, महावीर हनुमान, आश्विन पछिलाई माँ बगलामुखीको स्तुति आराधना तथा उपाशना गर्नाले ग्रहको दुष्प्रभावलाई कम गर्न मद्दत हुनेछ । विशेष ग्रह अबरोधमा स्थानीय जातिको (लोकल) गाईको सेवा वा सोक्षेत्रलाई सहयोग पुर्याएर पनि ग्रहजनित दुष्प्रभावलाई न्यूनगर्न सकिन्छ ।

वृष राशि (इ.उ.ए.ओ.वा.वि.वु.वे.वो.) –

वृष राशि हुनेहरूको लागि यो वर्ष आंशिक पक्षमामात्रै अनुकूल रहेको छ । रपनि पूवार्धको तुलनामा उत्तरार्ध केही उपलब्धिमूलक हुनेछ । अत्यावश्यक तथा विशेष काम बनाउन अल्लि बढी परिश्रम गर्नुपर्ने छ । सन्तानकष्टको सम्भावना देखिएको छ । जन्मकालमा सम्बन्धित ग्रह प्रतिकूल भई सन्तानदोष व्यहोर्न परिहेकाहरूको लागि सावधानी अप्नाउन पर्ने देखिएको छ । विशेष गरी गर्भवतीहरूले बढी ध्यान पुर्याउन जरुरी हुनेछ । रोग–शोक र कुसंगतको खतरा आवश्यक उपाय अथवा सावधानी अप्नाउनु होला । बढी संघर्ष र कम उपलब्धिको कारण मानसिक उद्दिग्नता तथा उदासिनता बढ्न गइ आस्थाको धरोहरमा ह्रास आउने एवं किंकर्तव्यविमूढताको मनोविज्ञानले प्रसय पाउनसक्ने देखिन्छ । साउन उपरान्त केही सुधार आइ कामकार्य एवं अन्य परिस्थितिमा केही सुधार आउनेछ । वर्षको उत्तरार्ध विवाहयोग्य युवायुवतीको लागि विवाहबन्धनको सम्भावना दह्रो छ ।

यो वर्ष अनिष्ट फललाई न्यून गर्न हतोत्साही नभइ इष्टदेवको भक्ति तथा साधनालाई बढीभन्दा बढी बढाउनु र शनि एवं गुरुको प्रतिकूलतालाई शान्ति गर्न हनुमान–शनिमहाकाल वा महाकाली, भैरव–छिन्नमस्ता र विद्यार्थीले सरस्वती तथा सर्वसाधारण सबैले वगलामुखी मा“ एवम् कुलदेवताको श्रद्धाभक्ति, जपपाठ, स्तुति आदि व्रत अवलम्वन गर्नु हितकर हुने छ । स्थानीय जातिको (लोकल) गाईको सेवा गर्नाले ग्रहको दुष्प्रभाव कम गर्न विशेष मद्दत हुनेछ ।

योगसाधनाको साथमा आफ्नो चेतना र भौतिक हैसियतको स्थिति अनुसार कञ्जुस्याई एवं हेल्चेक्र्याई नगरी अन्तर् आत्मादेखिनै श्रद्धापूर्वक ग्रहशान्तिको उपाय अवलम्बन गर्नाले धेरै हद्सम्म ग्रहको दुष्प्रभाव कम भई शुभफल प्राप्त हुनेछ । स्थानीय जातिको (लोकल) गाईको सेवा वा सोक्षेत्रलाई सहयोग गर्नाले ग्रहजनित दुष्प्रभावलाई न्यूनगर्न विशेष मद्दत मिल्नेछ ।

मिथुन राशि (का.कि.कु.घ.ङ.छ.के.को.ह.) –

मिथुन राशिको लागि यो वर्ष मिश्रित रहनेछ । वर्षको पूर्वार्ध तसै अनुकूल रहनेछ । संघर्षको बाबजुत केही उपलब्धि मिल्नेछ । विद्यार्थीहरूले गम्भीरताको साथमा समयको सदुपयोग गर्नाले अध्ययनमा प्रगति गर्न सकिने छ । व्यापार तथा पेशा एवं व्यवसायमा सामान्य लाभ मिल्ने छ । अल्लि बढी परिश्रम एवं प्रयत्नले व्यवसाय र बढी महत्त्वपूर्ण कामकार्यमा सफलता मिल्ला ।

रपनि जन्मकालमा पापग्रह अकारक हुनेहरूको लागि दुर्घटना, दैविक विपत्ति तथा धनजनको क्षति, चोटपटक, यात्रामा कष्ट, वातव्याधि, स्नायु तथा नशा रोग, चीरफार एवं घाऊखटिरा र दाम्पत्यकष्ट जन्य स्थितिको सामना गर्नपर्ने देखिएको छ । परिबन्द, चोरी, राज्यबाट भय–कष्ट, गलत संगत, स्वजनबाट विश्वासघात, फसिने–ठगिने, नहुनेकार्यमा मन जाने–आसक्ति बढ्ने, मिथ्याऽपवाद, अपव्यय, समय टरेपछि पश्चाताप हुने आदि सम्भावनालाई ग्रहगोचरले लक्षित गरिरहेको छ । यी प्रतिकूल फल वर्षको पूर्वार्धमा भन्दा उत्तरार्धमा बढी घटित हुनेछन् ।

दीर्घरोगीहरूले सावधानी अप्नाउनु पर्ने हुन्छ । घर–जग्गाको कारोवारमा फसिनसक्ने सम्भावना छ । वैवाहिक कार्य वा प्रेममा विशेषमा ख्याल पुर्याउन जरुरी देखिन्छ । यौनरोग, गर्भाशय, मलाशय, ठूलोआन्द्रा, पौरुष ग्रन्थी, मिर्गौलामा संक्रामक रोग आदिको सम्भावनालाई पनि नकार्न नसकिने हुनाले तत्सम्बन्धी विषयमा संयम र सजग हुनु जरुरी देखिन्छ । प्रतिकूल ग्रहको दुष्प्रभाव घटाउन वर्षभरी योगसाधनाको साथमा भगवती स्तोत्र पाठ, भैरव–छिन्नमस्ताको दर्शन भक्ति, स्थानीय जातिको (लोकल) गाईको सेवा, काग–कुकुर सेवा र वर्षको उत्तरार्धबाट ब्रह्मज्ञानी गुरुजनको आर्शिवाद लिने, माँ बगलामुखी एवं सरस्वतीको स्तुति उपाशना गर्ने जस्ता उपाय अवलम्वन गर्नु हितकर हुनेछ ।

कर्कट राशि (हि.हु.हे.हो.डा.डि.डु.डे.डो.) –
कर्कट राशि हुनेहरूको लागि यो वर्ष सुधारोन्मुख छ, क्रमशः फलिफाप हुँदै जानेछ । विशेष गरी वर्षको मध्यबाट अनुकूलता बढ्ने छ । वर्षको पूर्वार्ध संघर्षकर नै देखिएको छ । दाम्पत्य–प्रेमकष्ट वा असमझदारी बढ्नसक्ने तथा अरु पनि समस्या आइपर्नसक्ने देखिएको छ । सोँच, होश र विवके पुर्याएर व्यवहार गर्नु पर्ला । शिरशूल, ढाड–कम्मर, घुँडा–खुट्टा तथा हाडजोर्नी–नशा एवं ग्रन्थीसम्बन्धी समस्या हुनसक्ने गोचर छ, स्वास्थ्य एवं आहार विहारमा ध्यान दिन जरुरी हुनेछ । संघर्ष र शत्रुको प्रभाव रहनेछ रपनि विचलित नभएमा अन्तमा सफलता मिल्ने छ ।

उत्तरार्धबाट राजनीति, समाजसेवा, प्रतिस्पर्धा आदिमा उपलब्धि र वीजय प्राप्त हुनेछ । रोजगार–पदप्रतिष्ठा एवम् पदोन्नती प्राप्त हुनेछ, व्यापार–व्यवसायका क्षेत्रमा प्रगति हुने र लाभ प्राप्त गर्नसकिने छ । नयाँ व्यवसाय सञ्चालन गर्न उपयुक्त रहनेछ । न्यायिक क्षेत्रमा विजय मिल्नेछ । विद्यार्थीहरूलाई अध्ययनमा सफलता मिल्नेछ । अपूरो अध्ययनलाई पनि पूरा गर्नसकिने छ सम्बन्धितहरूले समयको फाइदा लिनुहोला । वैवाहिक सम्बन्धमा सुधार, विवाहको पर्खाइमा रहेकाहरूको दाम्पत्यसम्बन्ध स्थापित हुनसक्ने छ भने प्रेम पारखीहरूको लागि पनि समय अनुकूल हुनेछ । सन्तान सुख मिल्नेछ । दिएको नफर्कने सम्भावना भने बढी रहेकोले कसैलाई धनसंपत्ति दिँदा निकै विचार पुर्याउनु पर्ला ।

यो राशि हुनेहरूले यो वर्ष ग्रहको दुष्प्रभाव न्यूनिकरण गर्न वर्षभरी योगसाधनाको साथमा भैरव उपाशना र वर्षको पूर्वार्धसम्म माँ बगलामुखीको भक्तिदर्शन तथा व्रतादि एवं विद्वान गुरुजनबाट आर्शिवाद मार्गदर्शन ग्रहण आदि राम्रो तरिकाले गर्नु शुभप्रद हुनेछ । स्थानीय जातिको (लोकल) गौसेवा गर्नु विशेष शुभकर हुनेछ ।

सिंह राशि (म.मि.मु.मे.मो.ट.टि.टु.टे) –

सिंह राशिका व्यक्तिलाई यो वर्ष तुलनात्मक अनुकूल महसूस हुनेछ । आफ्नो व्यवहारमा भने ध्यान दिन जरुरी हुनेछ । मान्छेहरूको मुल्याङ्कनमा अल्लि कमजोरी फेला पर्ने हो कि भन्ने सम्भावना छ । ज्ञानोन्माद्ले विद्यार्थीहरूलाई असर गर्ने भय छ । संयमपूर्वक अघि बढ्नाले मात्रै अध्ययनमा सफलता मिल्नेछ । जन्म समयमा शनि आदि ग्रह प्रतिकूल हुनेलाई पेट, स्नायू आदिमा स्वास्थ्य समस्या, नीति–व्यवहार र सैद्धान्तिक पक्षमा विचलन आदिको सम्भावना छ । सन्तानकष्ट चिन्ता, असन्तोष, असमझदारी तथा खर्च एवं अपहेलित हुनपर्ने हुनसक्छ भने गर्भावस्थामा रहनु भएकाले विशेष ख्याल पुर्याउनु पर्नेछ ।

सञ्चित धनको आकस्मिक खर्च गराउने तथा गएको पैसा नफर्किने हुनसक्ने छ । लुच्चा तथा किर्पणीसँगको व्यवहार हुनाले धनसम्पत्ति फस्नसक्ने पनि डर देखिन्छ । तान्त्रिक आदि गुप्त विद्याको अभिलाषा बढ्ने, भूमिगत एवम् जासुसि कर्ममा उद्यत हुने बुद्धि पलाउने सम्भावना देखिन्छ । जसबाट बचेको राम्रो हुनेछ ।

पशुपालन, कृषिकर्मजन्य व्यवसाय, प्राविधिक क्षेत्रबाट भने फाइदा उठाउन सकिने छ । तत्त्वोन्मादको वाबजुत पनि धर्म–अध्यात्मको पक्षमा भने सफलता मिल्ने छ । यो वर्ष विद्यार्थीले विशेष र अन्यले पनि शनिको साथै राहुको दुष्प्रभावलाई न्यूनिकरण गर्न योगसाधनाको साथमा हनुमान चालिसा, भगवती स्तोत्र, भैरवस्तोत्र, बगलामुखी स्तोत्र आदिको पाठ, महाकालशनि, माँ बगलामुखी, भैरवदेव, काली, छिन्नमस्ता आदि देवदेवीको सात्त्विक पूजापाठ, ध्यानधारणा, व्रत आदि उपाशना अवलम्वन एवं स्थानीय जातिको (लोकल) गौसेवा वा सो क्षेत्रलाई सहयोग गर्नुले ग्रहजनित दुष्प्रभावलाई कम गर्न मद्दत हुनेछ । आफूलाई ब्रह्मविवेकदेखि नै श्रद्धा लाग्ने गुरुको सान्निध्यता तथा आर्शिवाद ग्रहण गर्नु पनि शुभप्रद हुनेछ ।

कन्या राशि (टो.प.पी.पु.ष.ण.ठ.पे.पो.) –

कन्या राशि हुनेहरूको लागि यो वर्ष संघर्षको अनुभूति गराउने खालको छ । रपनि वर्षको पूर्वार्ध केही उपलब्धिकर रहेको छ । प्रवचन, अध्यापन, उद्घोषण, गायन आदि वाणीवृति हुनेहरूले समाजमा राम्रो प्रभाव पार्नसकिने छ । कुटुम्बिक सम्बन्ध बढ्नसक्ने छ । अल्लि बढी प्रयत्न गरेर रोजगारी आदिमा सफलता प्राप्त गर्न सकिनेछ भने घरभन्दा तथा विदेश यात्रा आदिमा पनि अनुकूल रहनेछ । दानपूण्य, विवाहव्रतबन्ध आदि माङ्गलिक कार्य हुनजाने छ । विद्यार्थी तथा शिक्षासँग सम्बन्धितले ज्ञानोन्माद् नगरी समयको सदुपयोग गरेको खण्डमा शुभ परिणाम हात पार्न सकिएला ।

वर्षको उत्तरार्धमा संघर्षको मात्रा बढ्ने लक्षण देखिन्छ । आवश्यक सावधानी तथा उपायहरूअवलम्बन गर्नु बुद्धिमानी हुनेछ । बढी ईच्छाइएको तथा महत्त्व दिइएको कार्यमा भने ढिलासुस्ति तथा बाधा अड्चन नआउला भन्न सकिन्न । चोटपटक–घाऊ खटिरा जन्य रोग, दैविक विपत्ति, व्यवहारिक एवम् घरायसी समस्याहरूले दुःख दिनसक्ने भएकोले हरप्रकारको सावधानी अप्नाउनु आवश्यक देखिन्छ । कुलमा रोगको प्रकोप, मान्यजन वियोगको सम्भावना तथा आफन्त, साथीभाई, छरछिमेकी, सहकर्मी आदिसँग असमझदारीको सामना गर्नुपर्ने हुनसक्ने छ । मुद्धामामिला पर्नसक्ने, घर–जग्गाको कार्यमा विश्वासघात–धोका हुने, फसिने तथा पछुतो हुने समय परेकोले सित्तिमिति कसैको भरोसा नगरेकै राम्रो हुनेछ ।

व्यापार–व्यवसायमा देखिएको मन्दि, समाजसेवा, राजनीति, जागिरमा आएको अपजश, दुःखविमार, पशुचौपाया तथा घरजग्गा एवम् कृषि आदिमा देखिएको समस्यालाई न्यून गर्न योगसाधनाको साथमा हनुमान–शनिमहाकाल एवम् भैरवदेवको सात्त्विक तवरबाट स्तुति आराधना गर्नु मनासिव हुनेछ । स्थानीय जातिको (लोकल) गौ क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा गर्नुले ग्रहजनित दुष्प्रभावलाई कम गर्न मद्दत मिल्नेछ ।

तुला राशि (रा.री.रु.रे.रो.त.ति.तु.ते.) –

तुला राशिको लागि यो वर्ष मध्यम अनुकूल रहनेछ । नया“ र दीर्घकालिन कार्यको थालनीको लागि सो“चविचार तथा कार्ययोजना बन्ने, गुमेको मान प्रतिष्ठा फिर्ता गर्न सकिने, विग्रिएको सम्बन्ध एवम् कार्यहरूको पुनस्र्थापना तथा सुधार गर्न सकिने र अड्केर रहेका केही कार्यहरू पूर्ण हुनेछन् । न्यायिक क्षेत्र सबल रहनेछ । अबरोधको बाबजुत घरपरिवारमा दानपूण्य, विवाहव्रतबन्ध आदि माङ्गलिक कार्य हुनजाने छ ।

हात तथा छातिमा चोट वा रोग र दाजुभाईमा कष्ट वा वादविवादको सम्भावनालाई नकार्न सकिन्न । घरायसी किचलो, घरजग्गाको कारोबार आदिमा ढिलासुस्ति तथा फसिनसक्ने र जन्मकालमा ग्रह प्रतिकूल हुने तथा महादशामा पनि प्रतिकूल ग्रह चल्नेलाई दैविक विपत्ति आदि आइपर्न सक्ने भय छ । मान्यजन कष्टादिको सम्भावनालाई पनि नकार्न सकिन्न ।

वर्षको उत्तरार्धमा गोचर ग्रह थप अनुकूल देखिएको छ । सन्तती सुख मिल्नेछ भने उनीहरूको प्रगतिले खुशी प्राप्ति हुनेछ । नयाँ कार्यको थालनी, व्यवसायिक उन्नतिप्रगति, पदप्रतिष्ठा बढ्ने र सफलता मिल्नेछ । टाढिएका आफन्ति नजिकिने छन् । मान्यजनलाई भइरहेको कष्टमा सुधार आउनेछ । सुखसन्तोष लिन सकिनेछ । जग्गाजमिन जोडिने, गृहनिर्माण हुने र वाहन आदिको सुविधा प्राप्त हुनेछ । पशुचौपाया, कृषि आदिबाट फाइदा उठाउन सकिने छ । नोकरी मिल्नसक्ने छ । वैदेशिक यात्राको लागि पनि समय अनुकूल देखिन्छ ।

प्रतिकूलतालाई न्यूनिकरण गर्न योगसाधनाको साथमा बगलामुखी, भैरवदेव, छिन्नमस्ताको स्तुतिउपाशना गर्नु शुभकर हुनेछ । विद्वानजनको आर्शिवाद एवं मार्गदर्शन, असहाय गरीब दीनदुःखीको सेवा, बालबालिकालाई अध्ययनको पक्षमा सहयोग गर्नु र स्थानीय जातिका (लोकल) गोवंशको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा गर्नुले सम्भावित ग्रहको दुष्प्रभावलाई कम गर्न मद्दत मिल्नेछ ।

वृश्चिक राशि (तो.ना.नि.नु.ने.नो.य.यी.यु.) –

वृश्चिक राशिको लागि यो वर्ष धेरैजसो पक्षमा संघर्षप्रद देखिएको छ । हिम्मत पनि नगिराउने र नविराउने सिद्धान्तलाई आत्मसात गरेर अघि बढ्नुपर्ला । स्थान परिवर्तनको सम्भावना देखिन्छ । विदेशको बाटो हेरिरहेकाहरूको लागि ईच्छा पूरा हुनसक्ने छ । घर परिवारबाट टाढा गएर अध्ययन गर्नेहरूलाई उपलब्धि मिल्नेछ । तर बढी आसक्ति गर्ने, महत्त्वाकांक्षा राख्ने गर्दा ससाना कार्यले पनि अल्मल्याउँने, बहाना गर्न मन लाग्ने हुनेछ । अभिष्ट कार्यमा समय दिन नसकिने र अधिक परिश्रममा थोरै उपलब्धिले चित्त बुझाउनु पर्ने हुनेछ । चलिरहेको साविक कामकार्य एवं पेशामा संयमपूर्वक रत्रहनाले धेरथोर लाभै हुनेछ । चञ्चलता र हतारले भने क्षति एवं पश्चाताप गराउन सक्नेछ ।

जन्मकालमा शनि आदि ग्रह अकारक हुनेहरूलाई वादविवाद, कामकार्यमा अबरोध, मानप्रतिष्ठामा आँच, सञ्चित धनको खर्च, स्वास्थ्यमा समस्या, अपखबर र परिबन्दनीय परिस्थिति जस्ता प्रतिकूलता थोरधेर पर्ने छन् । विपरित खानपान, विश्वासघात, कुसंगत आदि प्रतिकूलताको सामना गर्नुपर्ने हुनसक्ने छ । तर जन्मकालमा शनि आदि ग्रह कारक तथा अनुकूल भएकाहरूको लागि भने प्रतिकूलको सट्टा अनुकूल फल प्राप्ति हुने एवं आकस्मिक लाभ र उपलब्धि मिल्नेछ ।

मानसिक उद्दिग्नता र निराशालाई हटाउन यथेष्ट धैर्यताको क्षमता बढाउनु बुद्धिमानी हुनेछ । अनिष्ट एवम् तनावलाई समन गर्न सर्वसाधारण सबैले योगदर्शनको उपदेशलाई आत्मसात गरी हनुमान तथा शनि महाकाल, भैरवदेव साथै माँ वगलामुखीको र विद्यार्थीले विद्याकी देवी सरस्वतीको भक्ति–स्तुति तथा श्रद्धा आराधना गर्नु हितकर हुनेछ । स्थानीय जातिका (लोकल) गाईको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा गर्नाले ग्रहको दुष्प्रभाव कम गर्न विशेष मद्दत हुनेछ ।

धनु राशि (ये.यो.भ.भि.भु.ध.फ.ढ.भे.) –

धनु राशिको लागि यो वर्षको पूर्वार्ध तुलनात्म रूपमा केही पक्षमा अनुकूल मान्न सकिन्छ रपनि सावधानी धेरैपक्षमा अप्नाउनपर्ने देखिन्छ । संघर्षको बाबजुत केहीहद्सम्म परिश्रमको फल मिल्ने र केही अधुरा कार्यहरू पूरा हुने छन् । धर्म–अध्यात्म, विवाह–व्रतबन्धादि माङ्गलिक कर्म सम्पन्न गर्नसकिने छ । अप्रत्यासित परिणाम दिने गोचर प्रभाव देखिएकोले एकातर्फ आसक्ति र अर्कोतर्फको उपलब्धि हुनसक्नेछ । राजनीति तथा समाजसेवामा अन्तिममा जश मिल्ने छ । जागिरको खोजिमा रहेकाहरूको लागि पनि शनिको विशेष उपाय गरेको खण्डमा अनुकूलताको सम्भावना छ । अनुकूलता महसूस हुँदैमा हौंसीने र मात्तिने गर्न भने हुनेछैन । जन्मको शनि आदि ग्रह अनुकूल रहनेहरूका लागि भने आकस्मिक लाभ एवम् पदप्रतिष्ठा, उन्नति प्रगति मिल्ने छ ।

विनामेहनतको आम्दानितर्फ चेष्टा बढ्नसक्ने सम्भावना समेत देखिएकोले सोबाट बचेको बुद्धिमानी हुनेछ अन्यथा पश्चाताप पर्नसक्छ । मिथ्याऽपवाद, दुर्घटना, दैविक विपत्ति तथा धनजनको क्षतिखति र दाम्पत्य कष्टप्रद देखिएको छ । विवाह तथा प्रेमसम्बन्धमा छलछाम हुनसक्ने छ सावधानी अप्नाउनु होला । परिबन्द, चोरी, राज्यबाट भय–कष्ट, गलत संगत, स्वजनबाट विश्वासघात, फसिने–ठगिने, व्यवहार बिग्रने, नहुनेकार्यमा मन जाने, पश्चाताप पर्ने गोचर प्रभाव देखिएको छ । स्नायू तथा उदर रोगले सताइ नै रहनेछ, दीर्घरोगिहरूले बढी ख्याल पु¥याइ नै रहनुपर्ला ।

आवश्यक सावधानी तथा ग्रहशान्ति उपाय अवलम्बन गर्नु बुद्धिमानी हुनेछ । योगदर्शनको उपदेशलाई आत्मसात गर्दै शनिस्तोत्रपाठ, शनिमहाकाल, हनुमान, भैरव तथा छिन्नमस्ताको उपाशना, श्रद्धाभक्ति एवम् व्रत गर्नु हितकर हुनेछ । स्थानीय जातिका (लोकल) गाईको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा गर्नाले ग्रहको दुष्प्रभाव कम गर्न विशेष मद्दत मिल्ने छ ।

मकर राशि(भो.ज.जी.जु.जे.जो.ख.खि.खु.खे.खो.ग.गी.) –

मकर राशिको लागि यो वर्ष पूर्वार्ध अल्लि बढी संघर्षप्रद देखिएको छ भने उत्तरार्ध तसै केही सुविस्ताजनक रहनेछ । उथलपुथलजन्य स्थितिलाई गोचरले संकेत गरेको छ । मिथ्या अपवाद, चारित्रिक एवम् नैतिक आँच, मुद्धामामिला–वादविवाद, अन्यौलता, कपटप्रेमको फन्दा, जन–धन तथा भौतिक सम्पत्तिको क्षती, दैविक विपत्ति, कूल–परिवारमा रोग, घाऊखटिरा–चोटपटक, वायु विकार–उदररोग, स्नायू आदि साध्यासाध्य स्वास्थ्य समस्याको सम्भावनालाई ग्रहगोचरले संकेत गरेको छ । विना परश्रमको धन प्राप्तिको चेष्टा, कुसंगत, समय छँदा होस नहुने पछि पश्चाताप हुने जस्तो पर्नसक्ने छ ।

तर जन्मसमयमा शनि आदि सम्बन्धित ग्रह अनुकूल अर्थात कारक रहनेको लागि भने प्रतिकूल फल कम घटित भइ आकस्मिक लाभ, पदोन्नति एवं राजमान तथा अधिकार पनि प्राप्ति हुनसक्ने छ । श्रावण पछि सुधार आउने र केही काममा सफलता मिल्ने छ । अत्यावश्यक केही काम तथा व्यवहार सुल्झाउन सकिनेछ । वेरोजगारीलाई नोकरी मिल्नसक्ने छ, मेहनत, संयम र धैर्यता पूर्वक बुद्धिले कामलिनु हितकर हुनेछ । संघर्षदायी कार्यमा सफलता मिल्ने छ । श्रमिक वर्गसँगको सहकार्य, झट्ट हेर्दा सफासुग्घर नदेखिने र खासै ईज्जतिलो नमानिएको तर लोक सेवा हुने एवम् सदाचारी कार्यमा सफलता मिल्ने छ । तर, गएको नफर्कने ग्रहगोचर भएकोले सरसापट् तथा लेनदेनमा निकै विचार पुर्याउनु पर्ला । त्याग एवम् ईश्वर प्रणिधानको भावनालाई प्रसय दिएर निष्काम कर्म गर्नु बुद्धिमानी हुनेछ ।

स्थानीय जातिका (लोकल) गाईको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा गर्नाले ग्रहको दुष्प्रभाव कम गर्न विशेष मद्दत मिल्ने छ । साथमा योगसाधना, विद्यार्थीले सरस्वती माताको, सर्वसाधारण सबैले हनुमानवीर, शनिमहाकाल, माँ बगलामुखी एवं कुलदेवताको स्तुति गर्नु शान्तिप्रद हुनेछ ।

कुम्भ राशि (गु.गे.गो.स.सी.सु.से.सो.द.) –

कुम्भ राशि हुनेहरूको लागि यो वर्ष समष्टिमा राम्रो छ । अवसरको सदुपयोग गर्ने र नहौंसिने हो भने धेरै क्षेत्रमा उपलब्धि प्राप्त गर्न सकिनेछ । विद्यार्थीहरूलाई अध्ययनमा सफलता मिल्नेछ । व्यापार–व्यवसायीका लागि विशेष प्रगतिकारक र कृषक–उद्यमी वर्गको लागि सुख एवम् लाभप्रद समय रहेको छ । राजनीति र समाजसेवा तथा जागिरमा पदोन्नती–प्रगति हुने देखिन्छ । दाम्पत्य एवं प्रेमसुखमा बढोत्तरी हुनेछ । विवाहयोग्यका लागि दाम्पत्य सम्बन्ध बाँधिने तथा प्रेमसम्बन्ध मजबुत हुनेछ । जग्गाजमिन एवम् वाहनादिको सुख सुविधा प्राप्ति हुने, सम्मानित यात्रा हुने, शत्रु तथा विपक्षि उपर विजय प्राप्त गर्नसकिने छ । यद्यपि कैफियत धनार्जन तर्फ पनि मन आकर्षित होला कि भन्ने छ जसले पछि पछुतोपनि पार्नसक्नेछ ख्याल गर्नुहोला । सत् धनार्जनबाटै आत्मसन्तुष्टि लिन सकिने छ । घरपरिवार एवं समाजमा हुने विशेष धार्मिक कृत्य सम्पादनमा भूमिका दिन सकिने छ । तीर्थयात्रादिको पनि सम्भावना रहेको छ । स्थानीय जातिका (लोकल) गाईको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा जन्य कार्यमा भूमिका दिनु अझै विशेष हितप्रद हुनेछ ।

चोटपटक, घाऊखटिराले भने सताउन सक्नेछ । पिलो, ग्रन्थी सुजन आदिको समस्या हुनसक्ने कुरालाई नकार्न सकिन्न । त्यस्तै दिएको धन फिर्ता हुन पनि कठिन पर्ने हुनसक्ने छ । श्रावणपछि भने सामान्यतया कामकार्यमा ढिला सुस्तिको महसूस हुनसकने छ ।

स्वास्थ्य लगायत सम्भावित ग्रहदोषको निवाराणको लागि भैरवदेव र श्रावणपछि माँ बगलामुखीको साथै विद्यार्थीले माँ सरस्वतीको स्तुतिध्यान एवम् श्रद्धाभक्ति तथा व्रतादि गर्नु हितकर हुने छ । गरीब दीनदुःखी तथा अनाथ क्षेत्रको सहयोगको लागि कुनै अभियानप्रद कार्य सञ्चालन गर्नु पुण्यप्रद हुनेछ ।

मीन राशि (दी.दु.थ.झ.ञ.दे.दो.च.ची.) –

यो वर्ष मीन राशिको लागि यद्यपि त्यति सहज देखिँदैन रपनि नबिराउनु र नडराउनुको सिद्धान्तलाई आत्मसात गर्दा हित हुनेछ । अधिकांश पक्षमा उथलपुथल, कर्मक्षेत्रमा बिरोध तथा अपयश र कतै हानी त कतै नसो“चेको सफलता एवं लाभ पनि मिल्नसक्ने छ । गर्दै आएको र भोग्दै आएको क्षेत्र, भोगाधिकार तथा पदप्रतिष्ठाबाट हात झिक्न पर्नसक्ने छ भने अप्रत्यासित रूपमा विभिन्न खालका प्रस्तावहरू आउने छन् तर नबुझि स्वीकार गर्नु घातक पनि हुन सक्नेछ । पैतृक संपत्ति, घरजग्गासँग सम्बन्धित काममा निकै सावधानी अप्नाउनु पर्ला ।

घरपरिवार, दाम्पत्यसम्बन्ध, यात्रा, मित्रसम्बन्ध आदिमा एकाएक असमझदारी बढ्ने तथा कष्ट पर्नसक्ने कुरालाई नकार्न सकिन्न । पितृ–मातृ तथा गुरुजन्य मान्यजनको कष्ट–वियोगसम्म व्यहोर्न पर्नसक्ने र शत्रुप्रभाव बढ्ने खगोलीय ग्रहको असर देखिएको छ । कतिपयलाई सन्तानमा असमझदारी तथा टाढिनु पर्ने वा कुनैप्रकारको पीडा हुनसक्ने छ । श्रावणपछि ग्रहगोचरले केही सकारात्मक प्रभाव देखाउने छ ।

पशुचौपाया तथा वाहनादिमा पनि क्षति हुने सम्भावना देखिएको छ । पछि पर्दाफास हुने पापकर्म एवम् कुधन आर्जनको चेष्टा नआउला भन्न सकिन्न । विशेष होसविचार तथा संयम नपनाए ईज्जत प्रतिष्ठामै धक्का लाग्नसक्ने छ ख्याल पुर्याउनु पर्ला । स्वकर्मलाई प्रसय दिने कर्मयोगीको लागि भने अपगाल तथा अपयशको बाबजुत भलै संघर्षको बढी अनुभूति किन नहोस अप्रत्यासित उपलब्धि र सफलता मिल्ने छ ।
यो वर्ष तपाईले योगसाधनाको साथमा भैरव, माँ बगलामुखी र विशेष रुपमा हनुमानदेवको साथै विद्यार्थीहरूले मा“ सरस्वतीको वन्दना दर्शनभक्ति गर्नु हितप्रद रहनेछ । स्थानीय जातिको (लोकल) गाईको क्षेत्रलाई सहयोग तथा सेवा जन्य कार्यमा भूमिका दिनु तपाईको लागि अझै विशेष हितप्रद हुनेछ ।

राशिफल कसलाई कति मिल्नेः

राशिफलमा बताइएको फल कसलाई कति मिल्ने भन्ने कुरा सम्बन्धित व्यक्तिको जन्म समयको सम्बन्धित ग्रहहरूकारक, अकारक, शुभाशुभ कस्तो स्थितिमा छन् त्यसमा भरपर्ने हुन्छ । जन्म समयमा ग्रहहरू अनुकूल रहेकाहरूलाई यहा“ बताइएका फलमा प्रतिकूल फल कम घट्ने र अनुकूल फल बढी घट्ने हुनेछ । त्यस्तै जन्म समयमा प्रतिकूल ग्रह हुनेहरूलाई प्रतिकूल फल बढी घट्ने र अनुकूल फल कम घट्ने हुन्छ । यहाँ समष्टिमा फल बताइएको हो । कति मिल्ने तथा नमिल्ने वा शुभ अशुभ कुन बढी हुने भन्ने कुरा सम्बन्धित व्यक्तिको उसको जन्मकालको ग्रहमा भरपर्ने हुन्छ । विशेष अवस्था पर्दा राशिफलको मात्र भर नपरेर विद्वान ज्योतिषीको मार्गदर्शन लिनु बुद्धिमानी हुनेछ ।

गौ–सेवा सबै प्रकारका अनिष्ट–ग्रह शान्तिको उपायः

जुन गाईको जुरो हुन्छ, गलामा माला हुन्छ, खुर दुईवटा हुन्छन्, सिङ् पिरामिड आकारको हुन्छ, यस्ता गुण सम्पन्न गाईलाई मात्रै वैदिक धर्मले गाईको संज्ञा दिएको छ । यी गाईनै वैदिक गाई हुन् । यिनै गाईलाई वैदिक सनातन धर्मले पूजनीय बताएको छ । यिनै गाईमा तेत्तिसकोटी देवीदेवताको बास हुन्छ । दुध तथा दुग्धजन्य पदार्थ यिनै गाईको मात्रै अमृतसमान हुन्छ नकि जर्सी, होलिस्टेन लगायतका गाईको ।

स्मरण रहोस बाहिरबाट भित्र्याइएका जर्सी, होलिस्टेन लगायतका गाई वैदिक गाईमा पर्दैनन् र यी गाईको दुध तथा दुग्धजन्य पदार्थ स्वास्थ्यको लागि हानिकारक भएको वैज्ञानिक रूपमै मेडिकल साइन्स आदिले प्रमाणित गरिसकेका छन् । जर्सी तथा होलिस्टेनिक लगायतका बाहिरबाट भित्र्याइएका र गाईमा हुनपर्ने जुरो, दुई खुर, माला, पिरामिड आकारको सिङ् नभएका गाईमा पूजनीय गुण पाइदैन ।

तेत्तिसकोटी देवीदेवताको बास हुने हाम्रो स्थानीय जातिका वैदिक गाईको सेवा गर्दा ग्रह बिग्रदा गरिने सबै देवीदेवता एवं ऋषिगणको सेवा हुन्छ, पूजा हुन्छ । त्यसैले नै सबैभन्दा ठूलो ग्रहशान्ति, जानअन्जानमा भएका पापकर्मको प्रायश्चित आदिको उपाय गौ सेवा हो । अतः यी गाईको संरक्षणको लागि विभिन्न तवरबाट यथाशक्य सहयोग आदि भूमिका निर्वाह गरेर पनि यहाँले आफ्नो अनिष्ट ग्रह शान्ति गर्नसक्नु हुन्छ । नेपालमा स्थानीय जातिका (लोकल) गाईको पालन पोषणको लागि सामाजिक संस्थाहरूबाट गौशालाहरू सञ्चालनमा आएका छन् ति गौशालाहरूलाई सहयोग गरेर पनि यसमा सहभागिता जनाउन सकिन्छ । अन्य व्रत अनुष्ठान आदि गर्न नभ्याउनेहरूको लागि यो सजिलो उपाय हो ।

ज्योतिष श्री हरिप्रसाद जोशी

ज्ञान विज्ञान और धर्म

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