लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Monday, 1 September 2025

🌏 सत्ययुग से कलियुग तक – मेरा अनुभव 🌏

 



सत्ययुग में

👉 इंसानियत सबसे बड़ी ताक़त थी।

👉 रिश्ते बिना स्वार्थ के निभाए जाते थे।

👉 सच, धर्म और समानता ही जीवन का आधार था।


त्रेतायुग में

👉 रिश्ते मर्यादा और त्याग पर टिके थे।

👉 परिवार की अहमियत और भाईचारे की मिसालें थीं।


द्वापरयुग में

👉 स्वार्थ और लोभ धीरे–धीरे रिश्तों में दाख़िल हुए।

👉 परिवार बँटने लगे, फिर भी इंसानियत ज़िंदा थी।


कलियुग में भी…

👉 जब मैंने घर छोड़ा था, तब अपनों से पहचान होना ज़रूरी नहीं था।

👉 रास्ते में मिलने वाला अनजान भी मदद कर देता था।

👉 दोस्त रियल थे – साथ बैठना, हँसना, रोना और हर मुश्किल में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहना।


मगर आज…

👉 लोग अपनों को पहचानने से पहले मोबाइल की रील्स में गुम हो जाते हैं।

👉 एक-दूसरे से बात करने में हिचक होती है।

👉 रियल दोस्त धीरे-धीरे पीछे छूट गए और रील वाले अजनबी ज़्यादा अहमियत पा गए।

👉 इंसान रियल से ज़्यादा रील में खो गया है, दोस्ती अब स्क्रीन तक सिमटकर रह गई है।


🕊️

सीख यही है –

👉 युग बदलते रहेंगे, पर असली ताक़त हमेशा रियल रिश्तों में ही रहेगी।

👉 रील्स सिर्फ़ वक़्त काटती हैं, लेकिन रियल रिश्ते ही ज़िन्दगी सँवारते हैं।

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