सत्ययुग में
👉 इंसानियत सबसे बड़ी ताक़त थी।
👉 रिश्ते बिना स्वार्थ के निभाए जाते थे।
👉 सच, धर्म और समानता ही जीवन का आधार था।
त्रेतायुग में
👉 रिश्ते मर्यादा और त्याग पर टिके थे।
👉 परिवार की अहमियत और भाईचारे की मिसालें थीं।
द्वापरयुग में
👉 स्वार्थ और लोभ धीरे–धीरे रिश्तों में दाख़िल हुए।
👉 परिवार बँटने लगे, फिर भी इंसानियत ज़िंदा थी।
कलियुग में भी…
👉 जब मैंने घर छोड़ा था, तब अपनों से पहचान होना ज़रूरी नहीं था।
👉 रास्ते में मिलने वाला अनजान भी मदद कर देता था।
👉 दोस्त रियल थे – साथ बैठना, हँसना, रोना और हर मुश्किल में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहना।
मगर आज…
👉 लोग अपनों को पहचानने से पहले मोबाइल की रील्स में गुम हो जाते हैं।
👉 एक-दूसरे से बात करने में हिचक होती है।
👉 रियल दोस्त धीरे-धीरे पीछे छूट गए और रील वाले अजनबी ज़्यादा अहमियत पा गए।
👉 इंसान रियल से ज़्यादा रील में खो गया है, दोस्ती अब स्क्रीन तक सिमटकर रह गई है।
🕊️
सीख यही है –
👉 युग बदलते रहेंगे, पर असली ताक़त हमेशा रियल रिश्तों में ही रहेगी।
👉 रील्स सिर्फ़ वक़्त काटती हैं, लेकिन रियल रिश्ते ही ज़िन्दगी सँवारते हैं।

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