लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Saturday, 6 September 2025

🕯️ कहानी – इंतज़ार की ज़िंदगी 🕯️




सुबह आठ बजे से शाम तक, मशीनों और कागज़ों सिस्टम गुम हो जाता हूँ।

आठ घंटे की ड्यूटी ख़त्म होती है तो लगता है जैसे सांसें भी थक गई हों।


घर लौटते ही दीवारें चुपचाप ताकती हैं।

चूल्हा जलता है, खाने की थाली भरती है,

पर स्वाद कहीं खो जाता है।

सपनों की हंसी, अपनों की बातें—सब यादों में सिमट जाती हैं।


रात को दोस्ती की कुछ अधूरी गुफ़्तगू…

फिर बिस्तर पर गिरना, आँखें मूँद लेना…

सुबह फिर वही चक्र, वही कैद।


कभी सोचता हूँ—ये सिलसिला कब तक चलेगा?

कब मिलेगी आज़ादी इस 8 घंटे की जंजीर से?

कब दिन रात मेहनत के बदले सिर्फ़ जीने का दिन आएगा?


हर रोज़ इंतज़ार करता हूँ उस पल का,

जब ये थकान भरा सफ़र ख़त्म होगा,

जब अपने सपनों को पूरा कर पाऊँगा।


पर डर यही है…

कहीं इंतज़ार करते-करते हम खुद इंतज़ार के पास तो नहीं पहुँच जाएंगे?

कहीं वो दिन हमारी ज़िंदगी के कैलेंडर पर हमेशा अधूरा ही न रह जाए…



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✨ यह कहानी हर उस मज़दूर, कर्मचारी और सपने देखने वाले इंसान की है

जो रोज़ जीता है… पर अपने असली सपनों को सिर्फ़ इंतज़ार में टाल देता है।

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