लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Thursday, 14 August 2025

युगों का बदलता स्वरूप



सत्ययुग – धर्म का प्रकाश पूर्ण था। देव और दानव अलग-अलग लोकों में रहते थे, अच्छाई और बुराई की सीमाएँ स्पष्ट थीं।


त्रेतायुग – देव और दानव एक ही धरती पर रहने लगे, लेकिन फिर भी धर्म और अधर्म की रेखा साफ थी। श्रीराम और रावण का युद्ध इसका उदाहरण है।


द्वापरयुग – अच्छाई और बुराई का अंतर और घटा, अब वे एक ही कुल, एक ही परिवार में दिखने लगे। श्रीकृष्ण और कंस का संबंध, बाणासुर और श्रीकृष्ण का युद्ध, तथा बाणासुर की पुत्री ऊषा और श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह इसका प्रमाण हैं।


कलियुग – अब तो स्थिति यह है कि देवत्व और दानवत्व एक ही मनुष्य के भीतर बसते हैं। सुबह भगवान का नाम, तिलक और भजन; और दिनभर ईर्ष्या, छल, पाप, लालच, अपमान और असत्य।

सीख –

युग चाहे कोई भी हो, संघर्ष हमेशा धर्म और अधर्म का ही है। फर्क बस इतना है कि पहले शत्रु बाहर था, अब वह हमारे भीतर है।

कलियुग में विजय पाने के लिए हमें अपने भीतर के रावण, कंस और दुर्योधन को हराना होगा।



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