गौरा व्रतसमाप्ते तु, कुमाऊं-नेपाल देशके।
श्रद्धया पितृपूजार्थं, पितृपक्षो विधीयते॥१॥
महालये प्रभाते तु, तर्पणं जलदानकम्।
काला-तिलैः समायुक्तं, पिण्डदानं विशेषतः॥२॥
चौलानी चमल्या तीरे, काली-नद्याः समीपतः।
महाआली स्थले पुण्ये, श्राद्धकर्म प्रवर्तते॥३॥
सन्तानसिद्धये नित्यं, पितृणां मोक्षहेतवे।
श्राद्धं दद्याद् यथाशक्ति, तत् पुण्यं भवति ध्रुवम्॥४॥
गौरा पर्व सम्पन्न होने के उपरान्त उत्तराखंड कुमाऊँ तथा नेपाल के सुदूर पश्चिम में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) का शुभारम्भ होता है। यह पर्व पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद हेतु समर्पित होता है।
✨ पितृ पक्ष का महत्व
पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों को जल, तिल, कुश और पिण्ड अर्पित कर तर्पण करते हैं। ऐसा विश्वास है कि इन दिनों में पितरों की आत्माएँ पृथ्वी पर आती हैं और अपने वंशजों से अन्न, जल और श्रद्धा की अपेक्षा रखती हैं।
🪔 अनुष्ठान और विधि
प्रत्येक तिथि पर उस तिथि को दिवंगत हुए पितरों का श्राद्ध किया जाता है।
घर के आँगन या पवित्र नदी-तट पर तर्पण किया जाता है।
पिण्डदान में चावल, जौ, तिल, घी तथा जल का प्रयोग होता है।
परिवार के सभी सदस्य ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं।
ब्राह्मणों को भोजन कराना, दक्षिणा देना और पितरों के नाम से गरीबों को अन्न-वस्त्र दान करना पुण्यकारी माना जाता है।
घर-घर में पितरों के नाम से विशेष पकवान बनाकर अर्पित किए जाते हैं।
🌊 प्रमुख स्थान
नेपाल के सुदूर पश्चिम और कुमाऊँ क्षेत्र में पितृ पक्ष के अवसर पर महाकाली, काली नदी, चौलानी तथा चमल्या, बागमती , भागीरथी, हरिद्वार, रिषिकेश जैसी नदियों के तट पर श्राद्ध और तर्पण करने की विशेष परंपरा है। यहाँ दूर-दूर से लोग आकर अपने पितरों का स्मरण करते हैं।
🙏 लोकमान्यता
ऐसा विश्वास है कि पितृ पक्ष में किया गया तर्पण पितरों को तृप्त करता है और वे वंशजों को आयु, आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

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