लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Sunday, 24 August 2025

🌿 सत्ययुग से कलियुग तक — एक सच्चे इंसान की कहानी 🌿




कहते हैं, हर युग की अपनी पहचान होती है।

पर हर युग में सबसे अधिक सहना सच्चे इंसान को ही पड़ता है।


📖 सत्ययुग में —

सत्य ही सबसे बड़ा धर्म था।

सच्चा इंसान सम्मानित था,

उसकी वाणी और कर्म ही पूजा माने जाते थे।


📖 त्रेतायुग में —

धीरे-धीरे परिवर्तन शुरू हुआ।

राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को भी

अपनी पत्नी सीता की अग्नि-परीक्षा करानी पड़ी,

सिर्फ समाज की दृष्टि के लिए।

यही था सच्चाई का दर्द —

सच्चे को ही खुद को बार-बार साबित करना पड़ा।


📖 द्वापरयुग में —



स्थिति और बिगड़ गई।

पांडव सत्य और धर्म पर चले,

पर उन्हें वनवास, अपमान और युद्ध सब सहना पड़ा।

दूसरी ओर दुर्योधन जैसे झूठे, घमंडी और दिखावटी लोग

सत्ता और ऐश्वर्य का आनंद लेते रहे।


📖 कलियुग में —

यहाँ तो हालात और भी कटु हैं।

सच्चा इंसान चाहे जितना त्याग करे,

उसके हिस्से में दुख, अकेलापन और उपेक्षा ही आता है।

और झूठा आदमी,

जो दिखावे की दुनिया सजाता है,

लोगों की नजर में सम्मान, प्रेम और आदर का पात्र बन जाता है।


💔 यही है वह पीड़ा,

जो हर युग में सच्चे इंसान को झेलनी पड़ती है।

सच हमेशा भीतर से ताक़त देता है,

पर झूठ हमेशा बाहर से इज्ज़त लूट लेता है।


✨ फिर भी,

इतिहास गवाह है कि युग बदलते रहते हैं…

पर अंततः जीत हमेशा सत्य की ही होती है।

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