लटैनाथ मल्लिकार्जुन

Wednesday, 20 August 2025

🌸 गौरा पर्व (उत्तराखंड कुमाऊँ और नेपाल के सुदूर पश्चिम) 🌸




गौरा पर्व भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से लेकर दशमी तक मनाया जाता है। यह पर्व देवी गौरा (पार्वती) और भगवान शिव के विवाह का प्रतीक है।


1. गौरा पर्व से पहले की तैयारियाँ


1. बिरुड़े बोना – गेहूँ, जौ या धान के दाने मिट्टी/डगरे में बोकर पवित्र हरियाली उगाई जाती है।



2. गौरा प्रतिमा बनाना – मिट्टी, कपड़े और घास से प्रतिमा बनाकर सजाया जाता है।



3. गीत व नृत्य की तैयारी – झोड़ा, चांचरी, चौफ़ला के अभ्यास होते हैं।



4. सफाई व उपवास – घर की शुद्धि, पूजा स्थल की सजावट और स्त्रियों का व्रत।


2. अष्टमी का दिन (मुख्य आरंभ)


1. गौरा का स्वागत – महिलाएँ प्रतिमा व बिरुड़े लेकर नदी/तालाब जाती हैं, स्नान व पूजा कर प्रतिमा घर लाती हैं।



2. पूजा-व्रत – सुहागिनें परिवार की समृद्धि और पति की लंबी उम्र हेतु पूजा करती हैं।



3. लोकगीत-नृत्य – मंडप में झोड़ा-चांचरी और चौफ़ला गाए-बजाए जाते हैं।



4. सिंदूर और फूल चढ़ाना – महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर बहनापा व सौभाग्य की कामना करती है।


3. नवमी का दिन (विवाह व रीतियाँ)


1. गौरा-शिव विवाह – नवमी को गौरा और शिव की मूर्तियों का विवाह रचाया जाता है।


विवाह में पारंपरिक ढोल-दमाऊ बजते हैं।


लोकगीतों में गौरा की मायके से ससुराल विदाई का चित्रण होता है।




2. सामूहिक झोड़ा-चांचरी – स्त्रियाँ और पुरुष मिलकर सामूहिक नृत्य करते हैं।



3. भोजन और मेल-मिलाप – लोग सामूहिक भोज करते हैं और गाँव-गाँव उत्सव जैसा माहौल होता है।


4. दशमी का दिन (विदाई व विसर्जन)


1. गौरा की विदाई – दशमी को गौरा देवी की प्रतिमा और बिरुड़े नदी/तालाब में विसर्जित किए जाते हैं।



2. विदाई गीत – महिलाएँ गीत गाती हैं जिसमें गौरा की विदाई और उनके ससुराल (शिवजी के घर) प्रस्थान का भाव रहता है।



3. समापन उत्सव – नृत्य-गीत, लोककथा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पर्व का समापन होता है।


✨ सारांश


पहले → बिरुड़े बोना, प्रतिमा बनाना, गीत-नृत्य की तैयारी।


अष्टमी → गौरा का स्वागत, पूजा-व्रत, झोड़ा-चांचरी।


नवमी → गौरा-शिव विवाह, सामूहिक नृत्य-भोज।


दशमी → गौरा की विदाई और विसर्जन।


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