भारत के उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल तथा नेपाल के सुदूर पश्चिमी भाग में मनाया जाने वाला गौरा पर्व आस्था, संस्कृति और लोक परंपराओं का अद्वितीय संगम है। यह पर्व देवी गौरा (पार्वती) और भगवान शिव के विवाह का प्रतीक माना जाता है। भाद्रपद मास की शुक्ल अष्टमी से लेकर दशमी तक यह पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
🌿 पर्व से पहले की तैयारियाँ
गौरा पर्व शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले से ही घर-घर में तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। महिलाएँ गेहूँ, जौ या धान के दाने मिट्टी के पात्र या डलिया में बोती हैं, जिन्हें बिरुड़े कहा जाता है। ये बिरुड़े हरियाली और समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। साथ ही मिट्टी, कपड़े और घास से गौरा देवी की प्रतिमा बनाकर उसे हल्दी, गेरू, रंग-बिरंगे वस्त्र और गहनों से सजाया जाता है।
गाँव की महिलाएँ आपस में मिलकर पारंपरिक झोड़ा, चांचरी और चौफ़ला जैसे लोकनृत्यों का अभ्यास करती हैं। ढोल-दमाऊ और हुड़का की धुन पर वे गीत गाती हैं जिनमें गौरा के मायके से ससुराल जाने, विवाह की रस्मों और शिव-गौरी के मिलन का वर्णन होता है। पर्व के आरंभ से पहले घरों की सफाई, पूजा-स्थल की सजावट और महिलाओं का व्रत-उपवास करना भी परंपरा का हिस्सा है।
🌸 अष्टमी का दिन
अष्टमी को पर्व की शुरुआत होती है। सुबह-सुबह महिलाएँ गौरा की प्रतिमा और बिरुड़े लेकर नदी-तालाब पर जाती हैं, वहाँ स्नान कर देवी की पूजा करती हैं और फिर प्रतिमा को घर अथवा मंदिर में लेकर आती हैं। घरों और गाँवों में मंडप सजाकर सामूहिक पूजा का आयोजन किया जाता है। सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
इस दिन गाँव की महिलाएँ रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर और फूल चढ़ाती हैं, जिसे सौभाग्य और बहनापे का प्रतीक माना जाता है। ढोल-दमाऊ की थाप पर झोड़ा-चांचरी गाए और खेले जाते हैं, जिससे वातावरण उल्लासमय हो उठता है।
💐 नवमी का दिन
नवमी को गौरा और शिव के विवाह की रस्में संपन्न की जाती हैं। गौरा की प्रतिमा का शिवजी के साथ विवाह कराकर पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। इन गीतों में गौरा की मायके से विदाई और ससुराल प्रस्थान का मार्मिक चित्रण होता है। विवाह के उपरांत गाँव में सामूहिक झोड़ा-चांचरी नृत्य होता है, और लोग सामूहिक भोज में सम्मिलित होते हैं। इस दिन का उत्सव गाँव की एकता और भाईचारे का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।
🌺 दशमी का दिन
दशमी को पर्व का समापन होता है। इस दिन गौरा देवी की प्रतिमा और बिरुड़े नदी अथवा तालाब में विसर्जित किए जाते हैं। महिलाएँ विदाई गीत गाती हैं जिनमें गौरा की ससुराल (शिव के घर) प्रस्थान का भाव झलकता है। विसर्जन के बाद लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं और पर्व की समाप्ति सामूहिक उल्लास के साथ होती है।
✨ निष्कर्ष
गौरा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसमें आस्था के साथ लोककला, लोकसंगीत और सामूहिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। बिरुड़े बोने से लेकर गौरा की विदाई तक का यह पर्व स्त्रियों की आस्था, परिवार की समृद्धि और समाज की एकजुटता का संदेश देता है।

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